राजस्थान, चित्तौड़गढ़ जिले की ग्राम पंचायत एराल के एक छोटे से गाँव ‘खेड़ी चारण ‘ में एक दलित बस्ती बसती है। यहाँ करीब 20 परिवार और 20-25 घर हैं। बरसों से इस बस्ती के पास पीने के पानी की कोई ठीक व्यवस्था नहीं थी। जो पाइपलाइन कभी पानी लाती थी, वो टूट चुकी थी, और पानी आना बंद हो गया था। इसका असर सबसे ज़्यादा पड़ता था घर की महिलाओं और बच्चियों पर। हर सुबह उन्हें 1-2 किलोमीटर दूर, पड़ोस के मुख्य गाँव जाना पड़ता था, जहाँ कुएं और हैंडपंप की सुविधा थी। पानी भरना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि रोज़ का एक लंबा और थका देने वाला संघर्ष बन चुका था।
गोमती कुमावत इसी बस्ती की रहने वाली हैं। CORO के कम्युनिटी लीडरशिप (CL) प्रशिक्षण से गुज़रने के बाद उनकी सोच में एक नया नज़रिया आया। उन्होंने अपने समुदाय की इस पुरानी समस्या को नए सिरे से, और गहराई से समझना शुरू किया। गोमती ने अकेले कुछ करने की बजाय, पूरे समुदाय के साथ बात करना शुरू किया। बस्ती में बैठकें हुईं, लोगों ने आपस में अपनी परेशानी साझा की। इसी बातचीत में एक सीधा-सा सवाल उठा – “पास के गाँव में लोगों को समय पर पानी मिल जाता है, तो हमें क्यों नहीं?”

यह सवाल छोटा था, लेकिन इसने समुदाय की सोच बदल दी। लोगों को एहसास हुआ कि पानी की व्यवस्था करना ग्राम पंचायत की ज़िम्मेदारी है, और यह पानी की सुविधा पाना समुदाय की ज़रूरत ही नहीं, बल्कि एक हक़ भी है। उन्होंने समझा कि समस्या अब सिर्फ ‘सहनी’ नहीं थी, बल्कि ‘उठानी’ थी।
समुदाय ने मिलकर तय किया कि वे यह मुद्दा ग्राम सभा में उठाएंगे। गोमती के नेतृत्व में पूरी बस्ती ने एक साथ ग्राम सभा में अपनी बात रखी और अपनी मांगों को लिखित रूप में पंचायत को सौंपा। यह किसी एक व्यक्ति की मांग नहीं थी, और न ही सिर्फ पानी के हक़ की लड़ाई; यह पूरे समुदाय की सामूहिक आवाज़ थी, जो एकता में विश्वास रखता था और चुनौतियों का हल मिलकर ढूंढने में यक़ीन रखता था। ग्राम सभा ने इस प्रस्ताव को सुना और स्वीकार किया। इसके बाद प्रक्रिया शुरू हुई, और लगातार तीन महीने की मेहनत के बाद, जुलाई में बस्ती के लिए ट्यूबवेल की स्वीकृति मिल गई।

आज खेड़ी चारण की इस दलित बस्ती के 20 परिवारों के पास अपने पानी की स्थायी व्यवस्था है। अब महिलाओं और बच्चियों को पानी के लिए रोज़ कोसों दूर नहीं जाना पड़ता। जो समय पहले पानी ढोने में जाता था, वो अब उनके अपने रोज़मर्रा के कामों के लिए बच रहा है।

लेकिन इस कहानी का असली मोल सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है। समुदाय ने अपनी मेहनत का सकारात्मक नतीजा अपनी आँखों से देखा, और इससे उनका हौसला और बढ़ गया। अब वे मानते हैं कि जो भी परेशानी आए, उसे मिलकर, संगठित होकर सुलझाया जा सकता है।

गोमती और उनके समुदाय की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि बदलाव की शुरुआत अक्सर एक सवाल से होती है, एक बातचीत से होती है, और जब यह बातचीत सामूहिक ताकत में बदल जाती है, तो बड़े से बड़ा हक़ भी हासिल किया जा सकता है।